प्रभु नाम की महिमा

 भक्त जनाबाई!!!!!!



ऐसा ही किस्सा भक्त जनाबाई का है । एक बार संत कबीर जनाबाई का दर्शन करने पण्ढरपुर गये । वहां उन्होंने देखा कि दो स्त्रियां गोबर के उपलों के लिए लड़ रही थीं । कबीरदासजी वहीं खड़े होकर देखने लगे । उन्होंने एक महिला से पूछा—‘आप कौन हैं ?’ 


महिला ने उत्तर दिया—‘मेरा नाम जनाबाई है।’ 


कबीरदासजी को बड़ा आश्चर्य हुआ कि हम तो परम-भक्त जनाबाई का नाम सुनकर उसके दर्शन के लिए आये थे और ये तो गोबर से बने उपलों के लिए झगड़ रही है ।


उन्होंने जनाबाई से पूछा—‘आपको अपने उपलों की कोई पहचान है ?’


जनाबाई ने उत्तर दिया—‘जिन उपलों से ‘विट्ठल’ ‘विट्ठल’ की ध्वनि निकलती हो, वे हमारे हैं ।’


कबीरदासजी ने उन उपलों को अपने कान के पास लगा कर देखा तो उन्हें ‘विट्ठल’ की ध्वनि सुनाई पड़ती थी । कबीरदासजी जनाबाई की भगवन्नाम जप की शक्ति को देखकर दंग रह गये ।


श्रीब्रह्मचैतन्य महाराज!!!!!!!!



दक्षिण भारत में एक ब्रह्मचैतन्य महाराज थे । वे सबको ‘राम-नाम’ जपने का उपदेश करते थे । किसी ने उनसे पूछा—‘आपके और हमारे जप में क्या अंतर है ?’ 


उन्होंने कहा—‘तुम आज रात बारह बजे मेरे पास आना ।’ 


ब्रह्मचैतन्यजी रात्रि में बारह बजे भजन के लिए बैठते थे । जब वह व्यक्ति ब्रह्मचैतन्य महाराज के पास आया तो उन्होंने उससे कहा—‘तुम मेरे अंगूठे से लेकर मस्तक तक कहीं भी कान लगाकर देखो ।’ 


जब उस व्यक्ति ने कान लगाकर सुना तो उनके रोम-रोम से ‘श्रीराम-श्रीराम’ की ध्वनि निकल रही थी ।


यह है भगवान के अखण्ड नाम-जप की महिमा जो हमें ईश्वरत्व के समीप ले दाता है ।


भगवन्नाम जप का केवल मानव शरीर पर ही प्रभाव नहीं पड़ता बल्कि वनस्पति जगत भी इससे प्रभावित होता है । तुलसीदासजी ने जब व्रजभूमि में प्रवास किया तो उन्होंने अनुभव किया कि व्रजभूमि में रहने वाले संत-भक्तों के सांनिध्य में वहां के वृक्ष व लताओं से भी ‘राधेश्याम’ की ध्वनि निकलती है—



वृन्दावन के वृक्ष को मरम न जाने रोय ।

ढार-ढार अरु पात-पात में, राधे-राधे होय ।।

राधा कृष्ण सबै कहत, आक-ढाक अरु कैर ।

तुलसी या व्रजभूमि में कहा सियाराम सों बैर ।। 

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