राम से बड़ा राम का नाम/नाम जप की महिमा
भगवन्नाम के निरंतर जप का मानव शरीर पर कितना अद्भुत प्रभाव होता है, यही दर्शाती विभिन्न भक्तों के जीवन की कथाएं ।
शब्द में बड़ी प्रबल शक्ति होती है । निरन्तर भगवन्नाम जप से मन की शुद्धि होती है, विवेक जाग्रत होता है । इससे हम अंदर से एक गुप्त दैवीय शक्ति का अनुभव करते हैं—मानो हम अपने आराध्य से जुड़ रहे हैं। यहीं से आशा, साहस, उत्साह और सफलता का आध्यात्मिक प्रवाह हमारे अंदर प्रवाहित होने लगता है; जिसके कारण हमारी चिन्ताएं, व्याकुलताएं, रोग-शोक और दुर्बलताएं नष्ट हो जाती हैं । भगवन्नाम का आश्रय लेने से सांसारिक सुख-दु:ख व मान-अपमान का असर मन पर नहीं होता है । यही आध्यात्मिक उन्नति धीरे-धीरे हमें स्वास्थ्य, सुख, शान्ति और संतुलन की ओर ले जाती है ।
निरन्तर नाम-जप करने से भी मनुष्य का शरीर व मन कभी श्रान्त नहीं होते, अवसाद (depression), चिन्ता (anxiety) उनसे कोसों दूर रहती है । मन सदैव प्रफुल्लित रहता है, उनका ललाट एक अद्वितीय तेज से चमकता रहता है । आवाज में गाम्भीर्य और मधुरता आ जाती है । भगवान (इष्ट) के दिव्य गुण उनके जीवन में प्रवेश करने लगते हैं ।
जितना अधिक भगवन्नाम जप किया जायेगा उतना ही अधिक शरीर के परमाणु (cells) मन्त्राकार हो जाते हैं । इस बात को भक्तों के जीवन-चरित्र का वर्णन करके सिद्ध किया जा सकता है—
भगवान विट्ठल के भक्त चोखामेला निम्न जाति के होने के कारण मन्दिर के अंदर नहीं जाते थे, बाहर से ही दर्शन करते थे । उनकी भक्ति से अभिभूत होकर भगवान को जब उन्हें देखने की इच्छा होती थी, तब भगवान विट्ठलनाथ स्वयं बाहर आ जाते थे । आज भी पण्ढरपुर में मन्दिर के बाहर उनका स्थान है ।
एक बार मजदूरों के साथ काम करते-करते आठ-दस मजदूरों के साथ चोखामेला की मृत्यु हो गयी । भगवान पण्ढरीनाथ की आंखों से अश्रुधारा बह निकली ।
भगवान ने संत नामदेवजी को प्रेरणा दी—‘भक्त चोखामेला की हड्डियों को एकत्रित करो ।’
नामदेवजी संशय में पढ़ गये कि इतनी सारी हड्डियों में भक्त चोखामेला की हड्डियां कौन-सी हैं ? तब भगवान ने उन्हें प्रेरणा दी कि—‘जिस हड्डी से ‘विट्ठल’ ‘विट्ठल’ की ध्वनि निकलती हो उन हड्डियों को एकत्रित कर लेना ।’
नामदेवजी ने जब हड्डियों को कान लगा कर सुना तो चोखामेला की हड्डियों से ‘विट्ठल’ ‘विट्ठल’ की ध्वनि सुनाई पड़ती थी ।



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